'प्रार्थना प्रवचनों में गाँधी'
(युवा 2019 में मेरे विचार के कुछ बिंदु)
हम एक स्मृतिहीन समय में जी रहे हैं। हमने अपने हिस्से की याद रखने वाली सारी बातों को ड्राइव और क्लाउड की वर्चुअल दुनिया के सुपुर्द कर दिया है। टेक्नोलॉजी पर हम इतना निर्भर हो गए हैं कि इसके अभाव में खुद की सहायता कर पाने में भी असमर्थ हैं। मोबाइल, इंटरनेट और ऍप्स की दुनिया ने हमसे हमारे निजी स्पेस को छीन लिया है। पग - पग पर पर्याय परोस कर हमारे सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित किया है। इस गैजेट ने बाहर की दुनिया को जितना सुविधाजनक बनाया हमारे भीतर की दुनिया को उतना ही खाली कर दिया है। हम लगातार आत्मचिंतन और मनन की आदतों से दूर होते जा रहे हैं। नेक्स्ट, नेक्स्ट और नेक्स्ट पर क्लीक करते हुए हम जितने अनिश्चित, संदिग्ध और दिशाहीन समय की ओर बढ़ते जा रहे हैं गाँधी हमारे लिए उतना ही प्रासंगिक होते जा रहे हैं।
भारत में ही नहीं पूरे विश्व में धर्म एक संवेदनशील मुद्दा बना रहा है। 'प्रार्थना-प्रवचन' में गाँधी धर्म की उन्हीं गुत्थियों को सुलझाते नज़र आते हैं। अपनी पहले ही प्रवचन में धर्म की बात करते हुए गाँधी जी कहते हैं कि "प्रार्थना करना हमारा धर्म है। हमारे दिल में प्रार्थनाएँ हों तो हमारे धर्म की रक्षा खुद ईश्वर करता है।"
यदि धर्म की रक्षा इतनी आसान है तो कोई भी धर्म खतरे में कैसे पड़ सकता है? और फिर भी अगर धर्म खतरे में है तो जाहिर है कि हमने खुद अपने धर्म की रक्षा नहीं की है। हमने प्रार्थनाओं को दिलों में जगह नहीं दी है। हमने ‘ईश्वर’ और ‘प्रार्थनाओं’ को इतना अप्रासंगिक बना दिया है कि गाँधी जी के प्रार्थना संबंधी विचार हमें एक मिथक की तरह लगने लगे हैं।
पहले खंड की पहली प्रार्थना में हिंदुओं द्वारा हुए अत्याचारों पर शर्मिंदा होते हुए गाँधी जी कहते हैं कि, "हिंदुओं ने किया यानि मैंने किया।" गाँधी जी का यह वाक्य दूसरों के कर्म पर समान धर्म का सदस्य होने के नाते केवल शर्मिंदा होने के लिए नहीं था। उनके इस वाक्य की प्रासंगिकता पर गौर करें और इसे व्यापक करके समझने का प्रयास करें तो प्रवचन के समय भरी सभा में सबके सामने कहा जाने वाला यह वाक्य एक साधारण वाक्य न हो कर पूरे समुदाय पर गहरा मनोवैज्ञानिक परिणाम करने वाला वाक्य है। इस वाक्य में खुद को धर्म से जोड़कर धर्म के नाम पर हुए दोष को खुद से जोड़कर आत्ममंथन की एक पूरी प्रक्रिया है।
मनोवैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार किसी भी परिणाम के लिए जब हम खुद को कारण मानते हैं तो खुद को बदलने अथवा सुधारने की कोशिश कर सकते हैं। खुद से हुए दोष को स्वीकार भी कर सकते हैं और नियंत्रित भी। जबकि इसके विपरीत जब तक हम दूसरों को दोषी मानते हैं तब तक वह 'दूसरा' हर किसी के लिए 'दूसरा' ही बना रहता है और कभी सुधार की परिधि में नहीं आ पाता और ना ही उस 'दूसरे' को नियंत्रित ही किया जा सकता है। उसके द्वारा हो रही हिंसाओं को कभी रोका नहीं जा सकता है। यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति उस 'दूसरे' को हटा दे और घटना को खुद से जोड़ कर खुद का मूल्यांकन करे तो 'दूसरे' के नाम पर हो रही हिंसाओं पर स्वतः रोक लग जायेगा।
धर्म पर बात करते हुए वे कहते हैं कि, "अत्याचार से कोई धर्म नहीं बच सकता। धर्म तो केवल धर्म पालन करने से बचता है। हर धर्म का व्यक्ति अपने धर्म की मर्यादा और संयम से पालन करे और दूसरों के धर्म में दखल न दे तो धर्म युद्ध कभी हो ही नहीं।" कितने सरल शब्दों में मतभदों को टालने की कोशिश की गाँधी जी ने जबकि आज का हर दूसरा व्यक्ति तीसरे के धर्म को मिटा देने पर तुला है। धर्म की जिस संकल्पना को गाँधी जी ने इतना मान दिया उसी संकल्पना को आज हमने कटघरे में खड़ा कर दिया है।
गाँधी जी के अनुसार सच्चा धर्म वही है जिसमें सब धर्मों का समावेश हो। तुलसीदास की भाषा में दयाभाव को हिंदू धर्म का मर्म बताते हैं और हिन्दू धर्म के सबसे अधिक सहिष्णु धर्म बताते हैं। कोई भी सहिष्णु धर्म निर्मम नहीं हो सकता। वह भीड़ का रूप ले कर हिंसा नहीं कर सकता। हम चाहें तो उनके प्रवचनों पर विचार कर सकते हैं। धर्म के नाम पर हो रही हिंसाओं के प्रति अपनी आँखें खोल सकते हैं। धर्मांधता की लहर में बहने से खुद को रोक सकते हैं।
गाँधी जी खुद को सच्चा हिन्दू कहते थे और एक सच्चा हिंदू होने के नाते ख़ुद को सच्चा मुसलमान बताते थे। ऐसा कहने के पीछे उनके अपने तर्क थे। उनका मानना था कि जैसे नाम अनेक होने पर भी ईश्वर एक है वैसे नाम अनेक होने पर धर्म भी एक है। इसलिए एक धर्म को सच्चाई से मानने वाला इंसान सच्चा हिन्दू भी है और मुसलमान भी, सिख भी है और ईसाई भी। किसी एक धर्म में कट्टर होने वाली संकीर्ण सोच को सारे धर्मों में बाँट कर कितनी सहजता से वे धर्मनिरपेक्ष हो जाने का संदेश देते थे। धर्म जैसे संवेदनशील मसले को सरल करके उसमें सद्भाव जोड़ कर जन मन में लौटा देने की अद्भुत शक्ति थी उनमें।
गाँधी जी अपनी सायंकालीन प्रार्थनाओं से देश में हो रही घूसखोरी को खत्म करना चाहते हैं। दुखद है कि बुरी नीयत और निजी स्वार्थ की प्रवृत्ति ने घूसखोरी से नहीं बल्कि गाँधी जी के इन विचारों से दूरी बनाए रखी। जिसका भयंकर परिणाम आज हम सबके सामने है।
इन प्रवचनों में गाँधी जी की दूसरी बड़ी चिंता अख़बारों को लेकर थी "यदि हमारे अख़बार दुरुस्त नहीं होंगे तो देश की आजादी किस काम की?" वे देश की जनता को सतर्क करते हुए वे कहते हैं कि, "मैं खुद अख़बारों की खबरों को सोलह आने सच नहीं मानता और अख़बार पढ़ने वालों को भी चेतावनी देता हूँ कि वे उनमें छपी कहानियों का अपने ऊपर आसानी से असर न पड़ने दें।" आश्चर्य है कि अख़बारों के प्रति गाँधी जी की चिंता आज भी उसी रूप में बनी हुई है, बल्कि आज यह स्थिति और भी सोचनीय है। मीडिया ने आज जनता के विश्वास को खो देने का काम किया। अपनी गलत नीतियों से लोकतंत्र के पाँचवें स्तंभ को दीमक की तरह चाट कर ध्वस्त कर दिया और अपने पतन को लगभग सुनिश्चित कर दिया है।
गो पालन, हिंसा और सुरक्षा के मुद्दे को भी हमारे देश में बड़े विचित्र ढंग से लिया जाता रहा है। गाँधी जी इस विषय पर चिंता व्यक्त करते हुए कहते है कि 'हिन्दुतान में पशु संभालने का काम सियासी आजादी पाने के काम से कहीं ज्यादा कठिन है।' वे चाहते थे कि हिंदुस्तान के लोग पहले पशुओं को ठीक से पालना सीख जाएँ।
देश की एकता और अखण्डता को वे स्वराज्य और रामराज्य मानते थे। उनके अनुसार जहाँ बहुमत वाले अल्पमत वालों को मार डालें वह जालिम हुकूमत है स्वराज्य नहीं है। गाँधी जी स्वराज्य प्राप्ति की लड़ाई में शहीद हो गए लेकिन आजादी के बहत्तर सालों बाद भी हम उनके स्वप्नों का स्वराज्य नहीं ला पाये। उनके अनुसार रामराज्य लाने के लिये सबसे पहले हमें अपने दोष को पहाड़ सम देखना होगा जबकि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ कोई अपना दोष देखना नहीं चाहता। यदि देख भी ले तो उसे मानता नहीं।
वे अहिंसा को इंसान की सबसे बड़ी ताक़त मानते थे। भक्त प्रह्लाद को वे अहिंसा का सबसे बड़ा उपासक मानते थे। गाँधी जी की अहिंसा कहीं न कहीं भक्त प्रह्लाद से प्रेरित थी। प्रह्लाद के 'नारायण' गाँधी जी की ज़बान पर 'राम' नाम से उच्चारित थे। अहिंसा की शक्ति को परिभाषित करते हुए वे टॉलस्टॉय का भी जिक्र करना नहीं भूले।
गाँधी जी ने चर्खा को अहिंसा का प्रतीक माना। चर्खे की तुलना एटम बॉम से की। आखिर चर्खा इतना शक्तिशाली क्यों?
मेरी समझ से चर्खा रचनात्मक प्रक्रिया का साधन है और सोपान भी। इसके प्रयोग से कारीगर रूई से सूत को निर्मित करता है। इस प्रकार की निर्मिति में उसे सब्र और धैर्य से काम लेना होता है। जहाँ धैर्य हो वहाँ उतावलापन नहीं हो सकता और जहाँ निर्मिति हो वहाँ विनाश को स्थान नहीं मिल सकता। चर्खा एकाग्रता और धीरज का साधक यंत्र है। यह नवनिर्मिती का संवाहक है इसलिए अहिंसा का प्रतीक है।
गाँधी जी का कहना था कि "हम हिन्दुस्तान के बनें हिंदुस्तान हमारा न बने।" देश का बनना अर्थात देश के प्रति पूर्णतः समर्पित रहना है जबकि देश को अपना बनाना देश से अपने स्वार्थ की सिद्धि पाना है। यदि हिंदुस्तान एक - एक का बनेगा तो बँट जायेगा और यदि सब हिंदुस्तान में अपने को समाहित मान लेंगे तो विश्व में हमारा देश एक सशक्त मुल्क के रूप में अपनी पहचान बना सकेगा।
जो योग्यता होने पर भी बदला न ले और अपने विवेक से अपमान को सह ले साधु वही है। गाँधी जी ने साधुता के नाम पर कभी ढोंग नहीं रचा। वे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सबके धर्म की रक्षा का दंभ भी नहीं भरते थे। अपने तर्कों और विचारों से वे विविध धर्मों में फैले कुविचारों के अंत करने वाले थे इसलिए संत थे।
गाँधी जी देश में बनियों का राज नहीं चाहते थे बल्कि लेखकों के हाथ में सत्ता देखना चाहते थे। सत्ता सम्हालना तो दूर आज सत्ता के इदारों में हस्तक्षेप करना भी खतरे से खाली नहीं है।
मुक्तिबोध जिस 'भीतर के आयतन' के सिकुड़ जाने की चिंता व्यक्त करते हैं गाँधी जी नई तालीम के जरिये उसी भीतर के आयतन को विस्तार देने की बात करते रहे।
वे अपने आप को मिस्कीन मानते थे लेकिन ये भी कहते थे कि "ऐन मौके पर आप मेरी बहादुरी देखेंगे। मैं किसी की लाठी के मुकाबले लाठी नहीं चलाऊँगा। मैं चाहता हूँ कि पागल के सामने हम पागल न बने। हम समझदार रहें तो सामने वाले का पागलपन चला जायेगा।" गाँधी जी का यह एक वाक्य बताता है कि गाँधी जी अपने आप में अनन्य रहे। देश में मध्यकाल जैसी विपत्ति अथवा स्वतंत्रता काल जैसी क्रांति के अलावा ऐसे विचारों का पुनः प्रस्फुटित हो पाना आने वाले समय में लगभग असंभव है।
गाँधी जी के अल्पसंख्यकों को इस मुल्क की संतान मानते थे। उनकी सलामती के लिए वे अंत तक छटपटाते रहे। गाँधी जी की इस छटपटाहट को यदि हम अपनी इंसानियत का मापदंड बना लें और अपने भीतर के आयतन को जाँचें कि हम उनकी विकलता को कितना महसूस कर पाते हैं और यदि हम सच में उस छटपटाह को हम महसूस कर पाते हैं तो निश्चित हम कभी किसी के लिए निर्मम नहीं हो सकते।
गाँधी जी देश की व्यवस्था को लेखकों के हाथ में थमाना चाहते थे। लेखकों और बुद्धिजीवियों से उन्हें देश की सलामती और शांति की उम्मीदें थी। आज वह समय है कि हम उनके अहिंसक विचारों से जुड़े और देश को संकीर्णता से जन्मी बीमारियों से मुक्त करें।
रज़ा साहब के शब्दों में ‘गाँधी बुद्ध के बाद भारत के दूसरे महामानव’ थे। मेरी समझ से वे आजादी के कठिन काल के दूसरे कबीर भी थे। यदि हम अपने समय में गाँधी जी की प्रासंगिकता को देखना चाहते हैं तो इस समय हमारे लिए सबसे जरुरी यही होगा है कि श्रद्धा - भक्ति से ऊपर उठकर हम उनके क्रांतिकारी रूप को देखें क्योंकि आगे आने वाले समय में उनका यही रूप लोकतंत्र को बचाने में सहायक सिद्ध होगा।