Sunday, October 13, 2019

'प्रार्थना प्रवचनों में गाँधी'

'प्रार्थना प्रवचनों में गाँधी'
(युवा 2019 में मेरे विचार के कुछ बिंदु)

हम एक स्मृतिहीन समय में जी रहे हैं। हमने अपने हिस्से की याद रखने वाली सारी बातों को ड्राइव और क्लाउड की वर्चुअल दुनिया के सुपुर्द कर दिया है। टेक्नोलॉजी पर हम इतना निर्भर हो गए हैं कि इसके अभाव में खुद की सहायता कर पाने में भी असमर्थ हैं। मोबाइल, इंटरनेट और ऍप्स की दुनिया ने हमसे हमारे निजी स्पेस को छीन लिया है। पग - पग पर पर्याय परोस कर हमारे सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित किया है। इस गैजेट ने बाहर की दुनिया को जितना सुविधाजनक बनाया हमारे भीतर की दुनिया को उतना ही खाली कर दिया है। हम लगातार आत्मचिंतन और मनन की आदतों से दूर होते जा रहे हैं। नेक्स्ट, नेक्स्ट और नेक्स्ट पर क्लीक करते हुए हम जितने अनिश्चित, संदिग्ध और दिशाहीन समय की ओर बढ़ते जा रहे हैं गाँधी हमारे लिए उतना ही प्रासंगिक होते जा रहे हैं।

भारत में ही नहीं पूरे विश्व में धर्म एक संवेदनशील मुद्दा बना रहा है। 'प्रार्थना-प्रवचन' में गाँधी धर्म की उन्हीं गुत्थियों को सुलझाते नज़र आते हैं। अपनी पहले ही प्रवचन में धर्म की बात करते हुए गाँधी जी कहते हैं कि "प्रार्थना करना हमारा धर्म है। हमारे दिल में प्रार्थनाएँ हों तो हमारे धर्म की रक्षा खुद ईश्वर करता है।"
यदि धर्म की रक्षा इतनी आसान है तो कोई भी धर्म खतरे में कैसे पड़ सकता है? और फिर भी अगर धर्म खतरे में है तो जाहिर है कि हमने खुद अपने धर्म की रक्षा नहीं की है। हमने प्रार्थनाओं को दिलों में जगह नहीं दी है। हमने ‘ईश्वर’ और ‘प्रार्थनाओं’ को इतना अप्रासंगिक बना दिया है कि गाँधी जी के प्रार्थना संबंधी विचार हमें एक मिथक की तरह लगने लगे हैं।

पहले खंड की पहली प्रार्थना में हिंदुओं द्वारा हुए अत्याचारों पर शर्मिंदा होते हुए गाँधी जी कहते हैं कि, "हिंदुओं ने किया यानि मैंने किया।" गाँधी जी का यह वाक्य दूसरों के कर्म पर समान धर्म का सदस्य होने के नाते केवल शर्मिंदा होने के लिए नहीं था। उनके इस वाक्य की प्रासंगिकता पर गौर करें और इसे व्यापक करके समझने का प्रयास करें तो प्रवचन के समय भरी सभा में सबके सामने कहा जाने वाला यह वाक्य एक साधारण वाक्य न हो कर पूरे समुदाय पर गहरा मनोवैज्ञानिक परिणाम करने वाला वाक्य है। इस वाक्य में खुद को धर्म से जोड़कर धर्म के नाम पर हुए दोष को खुद से जोड़कर आत्ममंथन की एक पूरी प्रक्रिया है। 
मनोवैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार किसी भी परिणाम के लिए जब हम खुद को कारण मानते हैं तो खुद को बदलने अथवा सुधारने की कोशिश कर सकते हैं। खुद से हुए दोष को स्वीकार भी कर सकते हैं और नियंत्रित भी। जबकि इसके विपरीत जब तक हम दूसरों को दोषी मानते हैं तब तक वह 'दूसरा' हर किसी के लिए 'दूसरा' ही बना रहता है और कभी सुधार की परिधि में नहीं आ पाता और ना ही उस 'दूसरे' को नियंत्रित ही किया जा सकता है। उसके द्वारा हो रही हिंसाओं को कभी रोका नहीं जा सकता है। यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति उस 'दूसरे' को हटा दे और घटना को खुद से जोड़ कर खुद का मूल्यांकन करे तो 'दूसरे' के नाम पर हो रही हिंसाओं पर स्वतः रोक लग जायेगा।

धर्म पर बात करते हुए वे कहते हैं कि, "अत्याचार से कोई धर्म नहीं बच सकता। धर्म तो केवल धर्म पालन करने से बचता है। हर धर्म का व्यक्ति अपने धर्म की मर्यादा और संयम से पालन करे और दूसरों के धर्म में दखल न दे तो धर्म युद्ध कभी हो ही नहीं।" कितने सरल शब्दों में मतभदों को टालने की कोशिश की गाँधी जी ने जबकि आज का हर दूसरा व्यक्ति तीसरे के धर्म को मिटा देने पर तुला है। धर्म की जिस संकल्पना को गाँधी जी ने इतना मान दिया उसी संकल्पना को आज हमने कटघरे में खड़ा कर दिया है।

गाँधी जी के अनुसार सच्चा धर्म वही है जिसमें सब धर्मों का समावेश हो। तुलसीदास की भाषा में दयाभाव को हिंदू धर्म का मर्म बताते हैं और हिन्दू धर्म के सबसे अधिक सहिष्णु धर्म बताते हैं। कोई भी सहिष्णु धर्म निर्मम नहीं हो सकता। वह भीड़ का रूप ले कर हिंसा नहीं कर सकता। हम चाहें तो उनके प्रवचनों पर विचार कर सकते हैं। धर्म के नाम पर हो रही हिंसाओं के प्रति अपनी आँखें खोल सकते हैं। धर्मांधता की लहर में बहने से खुद को रोक सकते हैं।

गाँधी जी खुद को सच्चा हिन्दू कहते थे और एक सच्चा हिंदू होने के नाते ख़ुद को सच्चा मुसलमान बताते थे। ऐसा कहने के पीछे उनके अपने तर्क थे। उनका मानना था कि जैसे नाम अनेक होने पर भी ईश्वर एक है वैसे नाम अनेक होने पर धर्म भी एक है। इसलिए एक धर्म को सच्चाई से मानने वाला इंसान सच्चा हिन्दू भी है और मुसलमान भी, सिख भी है और ईसाई भी। किसी एक धर्म में कट्टर होने वाली संकीर्ण सोच को सारे धर्मों में बाँट कर कितनी सहजता से वे धर्मनिरपेक्ष हो जाने का संदेश देते थे। धर्म जैसे संवेदनशील मसले को सरल करके उसमें सद्भाव जोड़ कर जन मन में लौटा देने की अद्भुत शक्ति थी उनमें।

गाँधी जी अपनी सायंकालीन प्रार्थनाओं से देश में हो रही घूसखोरी को खत्म करना चाहते हैं। दुखद है कि बुरी नीयत और निजी स्वार्थ की प्रवृत्ति ने घूसखोरी से नहीं बल्कि गाँधी जी के इन विचारों से दूरी बनाए रखी। जिसका भयंकर परिणाम आज हम सबके सामने है। 

इन प्रवचनों में गाँधी जी की दूसरी बड़ी चिंता अख़बारों को लेकर थी "यदि हमारे अख़बार दुरुस्त नहीं होंगे तो देश की आजादी किस काम की?" वे देश की जनता को सतर्क करते हुए वे कहते हैं कि, "मैं खुद अख़बारों की खबरों को सोलह आने सच नहीं मानता और अख़बार पढ़ने वालों को भी चेतावनी देता हूँ कि वे उनमें छपी कहानियों का अपने ऊपर आसानी से असर न पड़ने दें।" आश्चर्य है कि अख़बारों के प्रति गाँधी जी की चिंता आज भी उसी रूप में बनी हुई है, बल्कि आज यह स्थिति और भी सोचनीय है। मीडिया ने आज जनता के विश्वास को खो देने का काम किया। अपनी गलत नीतियों से लोकतंत्र के पाँचवें स्तंभ को दीमक की तरह चाट कर ध्वस्त कर दिया और अपने पतन को लगभग सुनिश्चित कर दिया है।

गो पालन, हिंसा और सुरक्षा के मुद्दे को भी हमारे देश में बड़े विचित्र ढंग से लिया जाता रहा है। गाँधी जी इस विषय पर चिंता व्यक्त करते हुए कहते है कि 'हिन्दुतान में पशु संभालने का काम सियासी आजादी पाने के काम से कहीं ज्यादा कठिन है।' वे चाहते थे कि हिंदुस्तान के लोग पहले पशुओं को ठीक से पालना सीख जाएँ।

देश की एकता और अखण्डता को वे स्वराज्य और रामराज्य मानते थे। उनके अनुसार जहाँ बहुमत वाले अल्पमत वालों को मार डालें वह जालिम हुकूमत है स्वराज्य नहीं है। गाँधी जी स्वराज्य प्राप्ति की लड़ाई में शहीद हो गए लेकिन आजादी के बहत्तर सालों बाद भी हम उनके स्वप्नों का स्वराज्य नहीं ला पाये। उनके अनुसार रामराज्य लाने के लिये सबसे पहले हमें अपने दोष को पहाड़ सम देखना होगा जबकि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ कोई अपना दोष देखना नहीं चाहता। यदि देख भी ले तो उसे मानता नहीं।

वे अहिंसा को इंसान की सबसे बड़ी ताक़त मानते थे। भक्त प्रह्लाद को वे अहिंसा का सबसे बड़ा उपासक मानते थे। गाँधी जी की अहिंसा कहीं न कहीं भक्त प्रह्लाद से प्रेरित थी। प्रह्लाद के 'नारायण' गाँधी जी की ज़बान पर 'राम' नाम से उच्चारित थे। अहिंसा की शक्ति को परिभाषित करते हुए वे टॉलस्टॉय का भी जिक्र करना नहीं भूले।

गाँधी जी ने चर्खा को अहिंसा का प्रतीक माना। चर्खे की तुलना एटम बॉम से की। आखिर चर्खा इतना शक्तिशाली क्यों?
मेरी समझ से चर्खा रचनात्मक प्रक्रिया का साधन है और सोपान भी। इसके प्रयोग से कारीगर रूई से सूत को निर्मित करता है। इस प्रकार की निर्मिति में उसे सब्र और धैर्य से काम लेना होता है। जहाँ धैर्य हो वहाँ उतावलापन नहीं हो सकता और जहाँ निर्मिति हो वहाँ विनाश को स्थान नहीं मिल सकता। चर्खा एकाग्रता और धीरज का साधक यंत्र है। यह नवनिर्मिती का संवाहक है इसलिए अहिंसा का प्रतीक है।

गाँधी जी का कहना था कि "हम हिन्दुस्तान के बनें हिंदुस्तान हमारा न बने।" देश का बनना अर्थात देश के प्रति पूर्णतः समर्पित रहना है जबकि देश को अपना बनाना देश से अपने स्वार्थ की सिद्धि पाना है। यदि हिंदुस्तान एक - एक का बनेगा तो बँट जायेगा और यदि सब हिंदुस्तान में अपने को समाहित मान लेंगे तो विश्व में हमारा देश एक सशक्त मुल्क के रूप में अपनी पहचान बना सकेगा।

जो योग्यता होने पर भी बदला न ले और अपने विवेक से अपमान को सह ले साधु वही है। गाँधी जी ने साधुता के नाम पर कभी ढोंग नहीं रचा। वे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सबके धर्म की रक्षा का दंभ भी नहीं भरते थे। अपने तर्कों और विचारों से वे विविध धर्मों में फैले कुविचारों के अंत करने वाले थे इसलिए संत थे।

गाँधी जी देश में बनियों का राज नहीं चाहते थे बल्कि लेखकों के हाथ में सत्ता देखना चाहते थे। सत्ता सम्हालना तो दूर आज सत्ता के इदारों में हस्तक्षेप करना भी खतरे से खाली नहीं है।

मुक्तिबोध जिस 'भीतर के आयतन' के सिकुड़ जाने की चिंता व्यक्त करते हैं गाँधी जी नई तालीम के जरिये उसी भीतर के आयतन को विस्तार देने की बात करते रहे।

वे अपने आप को मिस्कीन मानते थे लेकिन ये भी कहते थे कि "ऐन मौके पर आप मेरी बहादुरी देखेंगे। मैं किसी की लाठी के मुकाबले लाठी नहीं चलाऊँगा। मैं चाहता हूँ कि पागल के सामने हम पागल न बने। हम समझदार रहें तो सामने वाले का पागलपन चला जायेगा।" गाँधी जी का यह एक वाक्य बताता है कि गाँधी जी अपने आप में अनन्य रहे। देश में मध्यकाल जैसी विपत्ति अथवा स्वतंत्रता काल जैसी क्रांति के अलावा ऐसे विचारों का पुनः प्रस्फुटित हो पाना आने वाले समय में लगभग असंभव है।

गाँधी जी के अल्पसंख्यकों को इस मुल्क की संतान मानते थे। उनकी सलामती के लिए वे अंत तक छटपटाते रहे। गाँधी जी की इस छटपटाहट को यदि हम अपनी इंसानियत का मापदंड बना लें और अपने भीतर के आयतन को जाँचें कि हम उनकी विकलता को कितना महसूस कर पाते हैं और यदि हम सच में उस छटपटाह को हम महसूस कर पाते हैं तो निश्चित हम कभी किसी के लिए निर्मम नहीं हो सकते।

गाँधी जी देश की व्यवस्था को लेखकों के हाथ में थमाना चाहते थे। लेखकों और बुद्धिजीवियों से उन्हें देश की सलामती और शांति की उम्मीदें थी। आज वह समय है कि हम उनके अहिंसक विचारों से जुड़े और देश को संकीर्णता से जन्मी बीमारियों से मुक्त करें। 

रज़ा साहब के शब्दों में ‘गाँधी बुद्ध के बाद भारत के दूसरे महामानव’ थे। मेरी समझ से वे आजादी के कठिन काल के दूसरे कबीर भी थे। यदि हम अपने समय में गाँधी जी की प्रासंगिकता को देखना चाहते हैं तो इस समय हमारे लिए सबसे जरुरी यही होगा है कि श्रद्धा - भक्ति से ऊपर उठकर हम उनके क्रांतिकारी रूप को देखें क्योंकि आगे आने वाले समय में उनका यही रूप लोकतंत्र को बचाने में सहायक सिद्ध होगा।

Sunday, June 24, 2018

संस्मरण : बर्फ की सफेद चादर तले

आज के नवभारत टाइम्स, मुंबई के 'विधा विविधा' में मेरा
#संस्मरण : बर्फ की सफेद चादर तले

http://epaper.navbharattimes.com/details/5128-71351-1.html

पीछे खेल के मैदान से आती हुई बच्चों की धीमी पड़ती आवाज लगभग गायब हो चुकी थी। शीत का असर सड़कों पर उतर आया था। नाविक अपनी नावों को किनारे कर रैन बसेरे की ओर बढ़ चले थे। ठिठुरती शीत की ढ़लती शाम की नीलिमा में दूर तक झिलमिलाती नैनीझील का रंग स्याह पड़ चुका था। झील किनारे बिखरे तमाम सैलानी तल्लीताल के होटलों में समा चुके थे। स्ट्रीट लाइट की मध्यम रोशनी में मैं देर तक ताल के  किनारे - किनारे उस स्थान को खोजती रही जहाँ उस दस वर्षीय गरीब पहाड़ी बालक की आत्मा ने निष्ठुर संसार से बिदाई ली थी।

कल रात यहाँ बर्फ गिरी थी। बर्फ से उसका गहरा नाता था। वर्षों पूर्व ऐसी ही बर्फीली रात में वह भूखे पेट यहीं किसी बेंच पर सो गया था। उस रात वो ऐसा सोया कि फिर कभी नहीं उठा। उस कहानी को पढ़ने के बाद मैंने माना कि प्रकृति केवल स्त्रीलिंग शब्द ही नहीं उसमें माँ सी ममता भी है। वह अपने बच्चों को भूख से बिलखता नहीं देख पाती इसलिए जब अमीरों की दुनिया एक मासूम की छटपटाहट को महसूस नहीं कर पाती तब गहन शीत की अँधेरी रातों में प्रकृति उन लावारिसों के अर्धनग्न शरीरों पर हौले से बर्फ की सफेद चादर ओढ़ाकर इस कठोर जीवन से उन्हें मुक्ति दिला देती है ताकि रोटी और कंबल से वंचित रह रहे दुबले - पतले ठंडे पड़ चुके शरीरों को कफ़न के लिए वंचित न होना पड़े।

यदि उस रात कहानीकार जैनेंद्र ने उसे दस का नोट दे दिया होता या अगली सुबह बुलाने की बजाएँ कल रात ही उसे होटल में शरण दिला दी होती अथवा काम पर रखवा दिया होता तो शायद सुबह इस बेंच पर उस गरीब की लावारिस लाश न पड़ी होती। यदि उस रात ये सब घटित न हुआ होता तो जैनेंद्र द्वारा 'अपना - अपना भाग्य' कहानी लिखी न जाती और न ही इस कथा के पाठकों को एक छोटे से बच्चे के दुर्भाग्य पर रोना पड़ता। वह बालक जो अभी ठीक से अपना भाग्य भी बना नहीं पाया था। वह जो इस शहर में बिलकुल अकेला था और अभी कुछ दिनों पहले ही गरीबी की त्रासदी झेलते पहाड़ी गाँव के किसी गरीब परिवार से भाग कर दो वक्त की रोटी की तलाश में यहाँ चला आया था।

जैनेन्द्र के कथा साहित्य में वर्णित इस लाचार बालक की मृत्यु ने इस सुसंस्कृत समाज की नाटकीय व्यवस्थाओं को कई बार धिक्कारा। इस कहानी को कक्षा में पढ़ते - पढाते कई बार मेरा दिल पसीजा। आखिर वह कैसी जगह है? जहाँ बर्फीली रात में खुले आसमान के नीचे रैन बसेरा करने वालों के नसीब में सुबह का सूरज नहीं लिखा होता। यहाँ आने के और भी कई कारण हो सकते थे किंतु मुझे जैनेद्र की वह मार्मिक कहानी अक्सर यहाँ बुलाती रही। ये भी सच है कि यदि जैनेन्द्र की यह कहानी पाठ्यक्रम में न लगी होती और तीन साल लगातार इसे पढ़ाना न पड़ा होता तो शायद ही मैं नैनीताल आने के लिए विवश इतनी हुई होती!

मुझे यहाँ आये अभी तीन ही दिन हुए थे। सुना था इस बार की ठंड ने पिछले बारह वर्षों का रेकॉर्ड तोड़ दिया है। यहाँ के मौसम की कसौटी में मेरे लाये हुए सारे गर्म कपड़े फेल हो चुके थे। कल सुबह ही तल्लीताल के बाजार से ढेर सारे गर्म कपड़े खरीद लायी थी और शाम को अप्रत्याशित रूप से बर्फ भी गिरी। मैंने पहली ही बार बर्फ की बारिश देखी थी। मुंबई की पहली बारिश में बचपन में नाचने वाली आदत इस समय मन में उमंग जगा गयी। साथियों के मना करने के बाद भी गेस्ट हाउस के अहाते से निकलकर उस बारिश में भीग कर नाची थी। उस रात बिस्तर पर लेटते ही हड्डियों तक पहुँच चुकी शीत ने उसकी मौत वाली रात की याद दिला दी। वह दस वर्ष का बालक मेरे जेहन में पहले से घर कर चुका था। मेरे शहर की गुलाबी सर्दी बचपन से ही मुझे लुभाती रही किन्तु इसप्रकार की शीतलहरी से पहली बार मेरा पाला पड़ा था। लगातार चलने वाले हीटर से नाममात्र के गर्म हो रहे कमरे में सात रजाई के नीचे मैं देर रात तक उस कंपकपाती हुई सर्दी को अपने पोर – पोर में महसूस करने लगी जिसे शायद मौत से पहले उसने महसूस किया होगा। सुबह लेक्चर में भी मन नहीं लग पाया। शाम को क्लास से छूटते ही कुमाऊँ यूनिवर्सिटी के कैंपस से निकल कर सीधे नैनीझील के किनारे आ गयी।

धुंधली रोशनी में दूर तक झिलमिलाता ताल निःशब्द कोई शोकगीत सुना रहा था। मैं चर्च की बाईं ओर के लोहे की बेंच पर सिकुड़कर बैठ गयी। मुझे जैनेंद्र की कहानी में नैनीझील के किनारे लोहे के बेंच पर अंतिम बार लेटे उस बालक से लेखक के मिलने वाले प्रसंग की याद हो आयी। वर्षों पहले लेखक अपने मित्र के कहने पर होटल के गर्म कमरे की नर्म रजाई छोड़कर बर्फ सी जम चुकी झील के किनारे रात्रिभ्रमण के लिए आये थे। उस अकेले बालक को यहीं कहीं बेंच पर ठिठुरता देख उदार मन से वे उसे कुछ देने के इरादे से उसके पास भी गये किंतु अपने कोट की जेब में दस के नोट से छोटा कोई नोट न पा कर हाथ जेब से बाहर न निकाल पाये थे। उन दिनों दस का नोट भी बहुत कीमती हुआ करता था। कहानी में एक जगह उन्होंने लिखा भी है कि, “यदि दस का नोट दे देता तो अगले दिन के खर्च का हिसाब गड़बडा जाता।” वे विवश मन से कुछ देर वहीं खड़े रहे। फिर मित्र के चलने के आग्रह पर कल सुबह उससे सामने वाले होटल में मिलने की बात कहकर आगे बढ़ गए। सुबह पता चला कि रात गिरी बर्फ ने उसकी मासूम भूख को सदा के लिए शांत कर दिया है। शायद उनकी कहानी उसी ग्लानी की उपज थी।

इसी स्थान को देखने और उस निर्मम रात को करीब से महसूस करने के इरादे से मैं समुद्र किनारे की गर्म दुनिया से दूर उत्तराखण्ड के पहाड़ों पर शीतलहरी के प्रतिकूल मौसम में तीन हफ्ते के रिफ्रेशर कोर्स के बहाने नैनीताल और इस झील के किनारे खींची चली आयी थी।

#जयश्रीसिंह , मुंबई

Thursday, March 29, 2018

#संस्मरण : बर्फ की सफेद चादर तले



पीछे खेल के मैदान से आती हुई बच्चों की धीमी पड़ती आवाज लगभग गायब हो चुकी थी। शीत का असर सड़कों पर उतर आया था। नाविक अपनी नावों को किनारे कर रैन बसेरे की ओर लौट चुके थे। ठिठुरती शीत की ढ़लती शाम की नीलिमा में दूर तक झिलमिलाती नैनी झील का रंग स्याह पड़ चुका था।झील किनारे बिखरे तमाम सैलानी तल्लीताल के होटलों में समा चुके थे। स्ट्रीट लाइट की मध्यम रोशनी में मैं देर तक ताल के  किनारे - किनारे उस स्थान को खोजती रही जहाँ उस दस वर्षीय गरीब पहाड़ी बालक की आत्मा ने निष्ठुर संसार से बिदाई ली थी।

कल रात यहाँ बर्फ गिरी थी। बर्फ से उसका गहरा नाता था। वर्षों पूर्व ऐसी ही बर्फीली रात में वह भूखे पेट यहीं किसी बेंच पर सो गया था। उस रात वो ऐसा सोया कि फिर कभी नहीं उठा। उस कहानी को पढ़ने के बाद मैंने माना कि प्रकृति केवल स्त्रीलिंग शब्द ही नहीं उसमें माँ सी ममता भी है। वह अपने बच्चों को भूख से बिलखता नहीं देख पाती इसलिए जब अमीरों की दुनिया एक मासूम की छटपटाहट को महसूस नहीं कर पाती तब गहन शीत की अँधेरी रातों में प्रकृति उन लावारिसों के अर्धनग्न शरीरों पर हौले से बर्फ की सफेद चादर ओढ़ाकर उन्हें  इस कठोर जीवन से मुक्ति दिला देती है ताकि रोटी और कंबल से वंचित रह रहे दुबले - पतले ठंडे पड़ चुके शरीरों को कफ़न के लिए वंचित न होना पड़े।

यदि उस रात कहानीकार जैनेंद्र ने उसे दस का नोट दे दिया होता या अगली सुबह बुलाने की बजाएँ कल रात ही उसे होटल में ले जा कर काम पर रखवा दिया होता तो शायद सुबह इस बेंच पर उस गरीब की लावारिस लाश न पड़ी होती। यदि उस रात ये सब न घटित हुआ होता तो जैनेंद्र द्वारा 'अपना - अपना भाग्य' कहानी लिखी न जाती। इस कथा के पाठकों को एक छोटे से बच्चे के दुर्भाग्य पर रोना न पड़ता। वह बालक जो अभी ठीक से अपना भाग्य भी बना नहीं पाया था। वह जो इस शहर में बिलकुल अकेला था और अभी कुछ दिनों पहले ही गरीबी की त्रासदी झेलते पहाड़ी गाँव के किसी गरीब परिवार से भाग कर दो वक्त की रोटी की तलाश में यहाँ चला आया था।

जैनेन्द्र के कथा साहित्य में वर्णित इस लाचार बालक की मृत्यु ने इस सुसंस्कृत समाज की नाटकीय व्यवस्थाओं को कई बार धिक्कारा। इस कहानी को कक्षा में पढ़ते - पढाते कई बार मेरा दिल पसीजा। आखिर वह कैसी जगह है जहाँ बर्फीली रात में खुले आसमान के नीचे रैन बसेरा करने वालों के नसीब में सुबह का सूरज नहीं लिखा होता। यहाँ आने के और भी कई कारण हो सकते थे किंतु उस बालक की कहानी मुझे अक्सर यहाँ बुलाती रही। ये भी सच है कि यदि जैनेन्द्र की यह कहानी पाठ्यक्रम में न लगी होती और तीन साल लगातार इसे पढ़ाना न पड़ा होता तो शायद ही मैं नैनीताल आने के लिए इतनी विवश हुई होती!

मुझे यहाँ आये अभी तीन ही दिन हुए थे। सुना था इस बार की ठंड ने पिछले बारह वर्षों का रेकॉर्ड तोड़ दिया। इस मौसम की कसौटी में मेरे लाये हुए सारे गर्म कपड़े फेल हो चुके थे। कल शाम अप्रत्याशित रूप से बर्फ भी गिरी। मैंने पहली ही बार बर्फ की बारिश देखी थी। साथियों के मना करने के बाद भी उस बारिश में भीग कर नाची थी। उस रात बिस्तर पर लेटते ही हड्डियों तक पहुँच चुकी शीत ने उसकी मौत वाली रात की याद दिला दी। वह दस वर्ष का बालक मेरे जेहन में पहले से घर कर चुका था। हीटर से नाममात्र के गर्म हो रहे कमरे में सात रजाई के नीचे मैं देर रात तक कंपकपाती हुई उस सर्दी को महसूस करती रही जिसे शायद मरने से पहले उसने महसूस किया होगा! सुबह लेक्चर में भी मन नहीं लग पाया। शाम को क्लास से छूटते ही कुमाऊँ यूनिवर्सिटी के कैंपस से निकल कर सीधे नैनीझील के किनारे आ गयी।

धुंधली रोशनी में दूर तक झिलमिलाता ताल निःशब्द कोई शोक गीत सुना रहा था। मैं चर्च की बाईं ओर के लोहे की बेंच पर बैठ गयी। मुझे जैनेंद्र की कहानी में नैनीझील के किनारे लोहे के बेंच पर अंतिम बार लेटे उस बालक से लेखक के मिलने वाले प्रसंग की याद हो आयी। वर्षों पहले लेखक अपने मित्र के कहने पर होटल के गर्म कमरे की नर्म रजाई छोड़कर बर्फ सी जम चुकी झील के किनारे रात्रिभ्रमण के लिए आये थे। उस अकेले बालक को यहीं कहीं बेंच पर ठिठुरता देख उदार मन से वे उसे कुछ देने के इरादे से उसके पास भी गये किंतु अपने कोट की जेब में दस के नोट से छोटा कोई नोट न पा कर हाथ जेब से बाहर ही न निकाल पाये। उन दिनों दस के नोट की कीमत अधिक हुआ करती थी। कहानी में एक जगह उन्होंने कहा भी है कि "यदि दस का नोट उसे दे देता तो अगले दिन का हिसाब गड़बड़ा जाता।" वे विवश मन से कुछ देर वहीं खड़े रह गए। फिर मित्र के चलने के आग्रह पर कल सुबह उससे सामने वाले होटल में मिलने की बात कह कर आगे बढ़ गए। सुबह पता चला कि रात गिरी बर्फ ने उस बच्चे की मासूम भूख को सदा के लिए शांत कर दिया है।

इसी स्थान को देखने और उस रात को करीब से महसूस करने की इच्छा से मैं समुद्र किनारे की गर्म दुनिया से दूर उत्तराखण्ड के पहाड़ों पर शीतलहरी के प्रतिकूल मौसम में तीन हफ़्तों के रिफ्रेशर कोर्स के बहाने नैनीताल और इस झील के किनारे खींची चली आयी थी।

                                               - डॉ. जयश्री सिंह, मुंबई

Sunday, March 11, 2018

#संस्मरण # 'रात अकेली और मैं'



लगभग पूरा वेटिंग रूम खाली हो चुका था। अब तक न जाने कितने परिवार आये और अपनी ट्रेन के आने के साथ ही चले गए। एक मैं ही थी जो पिछले सात घंटे से अंजाने शहर के अंजाने स्टेशन पर अकेली बैठी अपनी ट्रेन की प्रतीक्षा कर रही थी। सामने बैठा एक यात्री जाने कब से मुझे घूर रहा था। मैंने यह दर्शाने की भरसक कोशिश की कि उनकी इस दृष्टि का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ रहा जबकि ठंड और डर के मारे मेरे पैर सुन्न पड़ रहे थे। जनवरी का महीना था। रात का तापमान दस डिग्री सेल्सियस के नीचे पहुँच चुका था। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी भाषा - शब्द और उच्चारण की शैली इस शहर में मेरे अजनबी होने का राज़ खोले। मैंने चुप रहने में भलाई समझी। इसके अलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं था। इस समय मैं अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर हरियाणा के अंबाला कैंट स्टेशन पर रात एक बजे अकेली बैठी एक अप्रत्याशित यात्रा का हिस्सा बन रही थी।

ऐसा नहीं कि ये मेरी पहली यात्रा थी। इससे पहले भी मैंने कई बार मुंबई से दिल्ली, बनारस (और चंडीगढ़ पहुँचने तक की) अकेली यात्राएँ की थी किंतु इसबार की यात्रा मुझे इसप्रकार असहाय बना देगी इसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

मैं चंडीगढ़ के पंजाब यूनिवर्सिटी में एक हफ़्ते के शॉर्ट टर्म कोर्स के लिए गयी हुई थी। इस कोर्स को इस मंगलवार से शुरु हो कर अगले सोमवार के दिन ख़त्म होना था। उसी शाम की फ़्लाइट से मुझे मुंबई लौटना था। हर बार की तरह अपनी इस यात्रा को भी मैंने सुनियोजित ढंग से तय कर लिया था किंतु कोर्स संयोजक ने शुक्रवार के दिन लंच के पहले वाले सत्र में अचानक ही अगले दो दिनों की छुट्टी घोषित कर दी। जबकि कोर्स के शेड्यूल में छुट्टी की कोई पूर्व सूचना नहीं थी।

इस कोर्स के लगभग सारे प्रतिभागी पंजाब - हरियाणा व आस - पास के क्षेत्रों से आये थे। दो दिनों की छुट्टी की सूचना पाते ही सोमवार को सीधे क्लास में आने का मन बनाकर वे सब अपने - अपने घर लौट गए। शुक्रवार शाम चार बजे तक चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस की दो मंजिला इमारत बिलकुल खाली हो गयी। दूसरे फ्लोर के आखरी कमरे में मैं ही एक अकेली बच गयी। दो दिनों के लिए मुंबई जा कर सोमवार को पुनः चंडीगढ़ लौट कर कोर्स पूर्ण कर पाना मेरे लिए संभव नहीं था। मैं कॉलेज से ड्यूटी लीव ले कर आयी थी ऐसे में इस कोर्स को पूर्ण कर लौटना मेरी मजबूरी थी। चंडीगढ़ मेरे लिए पूरी तरह नया शहर था। मैं यहाँ पहली बार आयी थी। बीते चार दिनों में लुधियाना, मोहाली से आयी हुई महिला प्रतिभागियों के साथ अकेलेपन का आभास ही नहीं हुआ किंतु आज अचानक से खाली हो जाने वाला गेस्ट हाउस मुझे कई प्रकार से डराने लगा था। शाम को पता चला कि हमारा केयर टेकर भी दो दिनों की छुट्टी ले कर घर जा रहा है। नीचे कैटिंग वालों को इस बात की जानकारी मिल चुकी थी कि अब उन्हें दो दिन केवल मेरे लिए ही खाना बनाना है। कोई जाने न जाने किंतु उन्हें तो मेरे वहाँ अकेले रहने की सूचना मिल ही चुकी थी। दिन का समय मैं जैसे तैसे काट लेती लेकिन खाली पड़ी इमारत के ऊपरी मंजिल पर दो दिन - तीन रात अकेले रहना मुझे कहीं सुरक्षित नहीं लग रहा था।

क्राइम पेट्रोल की सुनी - सुनायी वारदातें मेरे दिमाग में कौंध गयीं। अभी कल ही चंडीगढ़ में घटित एक घिनौनी घटना ने पूरे देश को दहला दिया था। मेरे पास सोचने का समय नहीं था। जनवरी का महीना और कड़ाके की ठंडी। मुझे अँधेरा होने से पहले निर्णय ले लेना था। मैंने जल्दबाजी में पर्स उठाया, कमरा लॉक किया, नीचे कैंटीन वालों को दो दिन मेरे लिए खाना न बनाने की सूचना दे कर अंबाला स्टेशन के लिए बस पकड़ ली।

आख़िरकार मैं जा कहाँ रही हूँ, मुझे खुद इस बात की कोई जानकारी नहीं थी। एक अंजाने शहर में जहाँ एक भी व्यक्ति मेरा परिचित नहीं था वहाँ मुझे तीन रात - दो दिन का समय अकेले काटना था। मैंने बस में बैठे - बैठे ही IRCTC की साइट पर जा कर अंबाला से आने - जाने वाली ट्रेनों का पता लगाया। पूरी साइट छान मारने के बाद मैंने अमृतसर जाने व आने का टिकट बुक कर लिया। इत्तेफ़ाक से दोनों समय मुझे मुंबई अमृतसर गोल्डन टेम्पल में रिजर्वेशन मिल गया। अंबाला से अमृतसर की दूरी चार घंटे की थी इतने में रात का समय सफर और प्लेटफॉर्म पर ट्रेन के इंतजार में काटा जा सकता था। दोनों ओर का टिकट निकाल कर परसों सुबह तक का समय मैंने सुरक्षित कर लिया था। अँधेरा होने से पहले मैं अम्बाला कैंट पहुँच चुकी थी और पिछले कई घंटों से वेटिंग रूम में बैठी घंटे गिन - गिन कर कठिन समय को काट रही थी।

इस समय रात के सवा एक बज रहे थे। आगे बढ़ने वाला समय भय और आशंका को बढ़ाने लगा था। मैंने बाहर प्लेफॉर्म पर आ कर देखा। वहाँ अच्छी खासी भीड़ थी। लोग जहाँ-तहाँ कंबल में लिपटे पड़े थे। प्लेटफॉर्म दो पर दृष्टि डाली। वहाँ लगभग ना के बराबर ही कोई था। मेरी ट्रेन 1:40 पर अंबाला कैंट के प्लेटफॉर्म दो पर आने वाली थी। ट्रेन के आने में आधे घंटे का समय था। बाहर ठंड अधिक थी। वहाँ देर तक अकेले खड़े रहना मुझे ठीक नहीं लगा। मैं वेटिंग रूम में लौट आयी। मैंने शाम को ही माँ को फोन कर सारी बात बता दी थी सिवाय इसके कि मैं अमृतसर अकेली जा रही हूँ। मैंने उन्हें सुरक्षित होने का पूरा विश्वास दिला दिया था जबकि इस समय मैं बिलकुल असहाय थी..., बिलकुल अकेली...और.., लगभग रुआँसी..।

वेटिंग रूम में बचे एकाध पुरुष यात्री अपना सामान सुरक्षित कर सो चुके थे। लगभग खाली पड़े कमरे में मैं अकेली अपने जीवन के कठिन क्षणों की परीक्षा दे रही थी। मैंने सुना था जिसका कोई नहीं होता उसका भगवान होता है। मैंने मन ही मन कण - कण में बसे उसे निराकार से अपनी रक्षा की गुहार लगायी और पूरे धैर्य से उस ट्रेन की प्रतीक्षा करने लगी जिसकी अब तक कोई सूचना नहीं थी।

कुछ ही देर में एक लड़का फोन पर बात करते हुए वेटिंग रूम में घुसा। मैं कुछ सतर्क हुई। वह सीधे मेरी बायीं ओर की बेंच पर जा कर बैठ गया। वह किसी से मराठी में बात कर रहा था। वह सामने वाले को बता रहा था कि मुंबई - अमृतसर गोल्डन टेंपल 1:50 तक आएगी। अतः कुछ ही देर में वह ट्रेन ले लेगा। वह  कौन था मुझे पता नहीं किंतु उसकी भाषा और उसकी ट्रेन यह बता रही थी कि वह मुंबई का रहने वाला है।

एक अंजाने शहर में अपनी जानी पहचानी भाषा का प्रभाव क्या होता है? यह मैंने पहली बार महसूस किया। हरियाणा में देर रात अपनी जिस बम्बईया हिन्दी के डर से मैं अब तक चुप बैठी रही उस समय मुझे अपनी उसी परिचित भाषा का वह अंजाना व्यक्ति भी बेहद विश्वसनीय लगने लगा। उसके फोन रखते ही मैंने उससे मराठी में कहा, "गोल्डन टेंपल एक पन्नास ला नाहीं, एक चाळीस ला येणार आहे." (गोल्डन टेंपल एक पचास पर नहीं, एक चालीस पर आने वाली है।) मराठी में कहे मेरे इस वाक्य ने उसे भी उतना ही चौंकाया जितना कि उसकी भाषा ने मुझे। वह कुछ देर आश्चर्य से मेरी ओर देखता रहा। मैंने दोबारा अपनी बात दोहराई। हम दोनों के बीच हल्की सी बहस हुई। फिर यह स्पष्ट हुआ कि मुझे 'मुंबई - अमृतसर गोल्डन टेंपल' से अमृतसर जाना है और उसे 'अमृतसर - मुंबई की गोल्डन टेंपल' से मुंबई। गुगल पर मिली जानकारियों से हमने यह पता लगाया कि दोनों यात्रियों की ट्रेन दस मिनट की देरी पर एक दूसरे को इसी स्टेशन पर क्रॉस करती है।

इसके पहले कि कोई और बात होती! मेरे ट्रेन के आगमन की घोषणा होने लगी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसके शहर की एक अकेली लड़की रात पौने दो बजे इस अंजाने स्टेशन से विपरीत दिशा में अकेली यात्रा करने वाली है। मेरे उठते ही उसने कहा, "चलिए, मैं आपको आपके कोच तक छोड़ देता हूँ।"

एक मैं जो अपने कारण किसी को भी कष्ट नहीं देना चाहती थी अतः बिना किसी को कुछ सूचित किये चुपचाप अपनी यात्रा का बोझ ढो रही थी और एक वो जिसे इस समय न जाने किस कर्तव्यबोध ने घेर लिया था। वह मेरी सहायता करने को तत्पर हो उठा। वह मेरी सीट के आस - पास मेरा सामान खोजने लगा। मैंने आगे बढ़ते हुए कहा कि मेरे पास कोई सामान नहीं है। मैं एक दिन के लिए जा रही हूँ। कल रात इसी ट्रेन से मुझे लौटना है।

उसे अपने साथ चलते देख मेरा आत्मविश्वास बल पा चुका था। मैं बड़ी फुर्ती से ब्रिज चढ़ने लगी। उतरने तक गाड़ी प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी। शायद! ही कोई इस ट्रेन से उतरा था। मैं लगभग दौड़ती हुई अपने कोच तक पहुँची। डिब्बे में चढ़ कर मैंने पीछे मुड़ कर देखा। वह धीरे - धीरे चलता हुआ वहीं कुछ दूर रुक गया था। मैंने उसे हाथ हिला कर 'बहुत - बहुत धन्यवाद!' कहा और भीतर आ गयी। ट्रेन लगभग भरी हुई थी। लोग गहरी नींद में सो रहे थे मैं चुपचाप अपनी सीट पर आ कर लेट गयी। मुझे देर तक नींद नहीं आयी। शाम से अब तक की सारी घटनाएँ क्रमबद्ध मेरे दिमाग में रील की तरह दौड़ने लगी।

एक अंजाने शहर में जानी पहचानी भाषा के एक अंजाने व्यक्ति का अचानक इस समय मिल जाना (जिस समय मुझे किसी अपने की बेहद जरुरत थी) मेरे लिए किसी दुर्लभ संयोग से कम नहीं था। मैं सोचने लगी कि मेरी गोल्डन टेंपल की जगह उसकी गोल्डन टेंपल 10 मिनट पहले आ सकती थी! या फिर मेरी ट्रेन लेट भी तो हो सकती थी। इस कुँहरे वाली रात में ट्रेनों का क्या भरोसा? वो मुझसे पहले भी निकल सकता था। आश्चर्य ही था कि मेरी ट्रेन राइट टाइम थी। सहसा मुझे वह वाक्य याद आया - 'जिसका कोई नहीं होता उसका भगवान होता है।'


Saturday, March 10, 2018

#संस्मरण# पीले फूल कनेर के...



    अँधेरा हो चुका था। सड़कों की भीड़ गायब हो चुकी थी। घड़ी पर नज़र पड़ी। सवा आठ बज चुके थे। किसी अनजाने शहर में शाम के आठ के बाद का समय भी एक अनजाने भय का कारण बन जाता है। शाम चार बजे जिस रिक्शे से हम होटल से कनक भवन गए थे उसके चालक ने हमारी आपसी बातचीत से भाँप लिया था कि हम शहरी हैं और यहाँ दर्शन के लिए आये हैं। चलते समय दो सौ में लौटने तक की बात तय हुई थी किन्तु शाम तक बातें बना कर उसने जबरन चार सौ रूपये वसूल लिए। होटल से कनक भवन की दूरी तीन – चार किलोमीटर से ज्यादा की न थी। जन्मभूमि, दशरथ महल, कनक भवन और हनुमान गढ़ी ये सारे स्थल दो – तीन मिनट की पैदल दूरी पर आसपास ही स्थित हैं। अत: सारे दर्शन हम एक ही बार में पूर्ण कर चुके थे। लौटते समय रास्ते में तुलसीदास उद्यान व राम पैड़ी पर कुछ पल ठहर कर अंत में सरयु की आरती देखकर हम होटल निकल जाना चाहते थे। किन्तु वह जिद पर अड़ गया कि वह आरती होने तक नहीं रुकेगा। किराया ले कर वह तुरंत निकल जाना चाहता था। हम आज सुबह ही आये थे और कल ही हमें लौटना भी था इसलिए माँ इसी समय सरयु की आरती देख लेना चाहती थी। हमारा रुकना अनिवार्य था और उसे जाने की जल्दी थी मेरे लाख कहने पर भी उसने रुकने से इन्कार कर दिया।

     शुरुवात में जो रिक्शे वाला मुझे गरीब लग रहा था वही शाम तक लालची और चालाक लगने लगा। जिसकी दीन दशा पर अब तक मुझे दया आ रही थी उसकी चालाकी देख अब मुझे अपनी उदारता पर गुस्सा आने लगा था। मैं उससे लड़ना नहीं चाहती थी और माँ को इस बात की बिलकुल भी भनक लगने देना नहीं चाहती थी कि वो तय से दुगुनी क़ीमत वसूल कर हमें होटल पहुँचाये बिना पक्के घाट पर ही उतार कर देर होने के बहाने चले जाना चाहता है। मैं जानती थी कि वो गलत है फिर भी उसकी गरीबी देख उसकी चालाकी पर कुछ भी कहना मुझे उचित न लगा। मैंने माँ की ओर देखा। माँ रिक्शे से उतर कर सरयु के प्रथम दर्शन कर प्रणाम करने में व्यस्त थी। मन में कुछ सोच कर बिना बात बढ़ाये मैंने अपना ठगा जाना स्वीकार कर लिया और उसकी ओर चार सौ रूपये बढ़ा दिए। सौ - सौ के चार करारे नोट जेब के हवाले कर फुर्ती से रिक्शे पर पैडल मारता हुआ वह तेजी से निकल गया। मैंने आज ही माँ से सुना था, 'ये देहात से जुड़ा इलाका है यहाँ - कहाँ कोई रिक्शे पर बैठता है। लोग दो - तीन किलोमीटर की दूरी पैदल चल कर ही तय कर लेते हैं।' मेरे दिन भर का निरिक्षण माँ के कहे सत्य को प्रमाणित कर चुका था। ऐसे में उसे आज दो - तीन घण्टे की कमाई के चार सौ रूपये मिल गए थे। इन रुपयों से वह अपने परिवार के न जाने कितने जरुरी काम निपटा लेगा यही सोच कर ठगे जाने के बाद भी मैंने संतोष कर लिया। सरयु की आरती देखने में आठ बज चुके थे। शाम से यहाँ - वहाँ घूम कर हम काफ़ी थक भी चुके थे। अब बस यही इच्छा थी कि जल्दी से कोई रिक्शा मिले और हम होटल पहुँचे।

      दिन भर कई रिक्शे वाले यहाँ - वहाँ खाली बैठे दिखते रहे किन्तु इस समय तो जैसे पैडल रिक्शे वालों का अकाल पड़ गया था। अँधेरा बढ़ने के साथ सड़कों पर भीड़ भी कम होती जा रही थी। एक दो रिक्शेवाले दिख भी गए तो वे होटल तक चलने को तैयार न हुए। अब तो स्थिति ये थी कि यदि कोई चलने को तैयार हो भी जाये तो हम उस पर विश्वास भी कितना करें! चिंता, डर, आशंका और माँ की डाँट के आगे मौन रह कर रिक्शा खोजने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं था। मैं मन ही मन भगवान को मनाने लगी। अवधबिहारी की भूमि पर उन्हीं से सुरक्षा और सहयोग की प्रार्थना करने लगी। तभी पीछे से सत्तर की उम्र का एक बूढ़ा धीरे - धीरे रिक्शा खींचता हुआ मेरे पास आया। उसकी उम्र और उसकी दशा देख कर मैंने उसे अनदेखा करने की भरसक कोशिश भी की। पर शायद उसने दूर से ही  मुझे रिक्शा रुकवाते देख लिया था। मेरे पास आ कर उसने मुझसे पूछा, "कहाँ जाओगी बेटी?" मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए? हम दो लोग और वो बूढ़ा। उत्तर में देरी होते देख उसने अपना प्रश्न दुहरा दिया। मुझे लगा कि शायद इसे पैसों की सख़्त जरुरत है तभी तो जब अधिकांश रिक्शे वाले घर जा चुके हैं तब भी वो अकेला सवारी की तलाश में रिक्शा लिए सड़क पर घूम रहा है। प्रतिउत्तर के इंतजार में देर तक वह मेरी ओर देखता रहा। बड़े संकोच से मैंने कहा - होटल रामप्रस्थ। उसने बड़ी गंभीरता से जवाब दिया,”बैठिये छोड़ देता हूँ। ज्यादा नहीं बीस रूपये दे देना।“ इस समय यदि कोई पचास भी माँगता तो हम बैठ जाते! पर उसके लिए तो बीस ही काफ़ी थे। मेरा अंदाजा सही ही था। उस गरीब के लिए उस समय बीस रूपये भी रात के भोजन के लिए पर्याप्त थे। ‘डूबते को तिनके का सहारा’ एक पल को लगा जैसे नियति ने हमें एक दूसरे की सहायता के लिए ही भेज दिया है। हम रिक्शे पर बैठ गए। वो धीमी गति से रिक्शा खींचता चल पड़ा। मैंने मन ही मन भगवान से पूछा, "हे अयोध्यापति! हे नाथ! आपकी नगरी में जीने खाने वाले ये लोग इतने गरीब क्यों हैं?"

      मैं मुंबई से अपनी माँ के साथ पहली बार अयोध्या आयी थी। मेरे लिए यहाँ सबकुछ नया था। मैंने बचपन में रामानंदसागर कृत 'रामायण' देखी थी। उसमें दर्शायी गयी अयोध्या नगरी मेरे कच्चे मानस पर रच बस गयी थी। चलते समय मेरे मन में रामजी की अयोध्या को देखने का बड़ा कुतूहल था। मन में अपार श्रद्धा और जिज्ञासा लिए मैं माँ के कहने पर उन्हें साथ ले कर अयोध्या आयी थी किन्तु यहाँ पहुँचने पर जो पाया वो मेरी कल्पना से सर्वथा भिन्न था। मेरे मन में अयोध्या की जो कल्पना थी वैसा यहाँ कुछ भी नहीं था। राजा राम की नगरी बिलकुल फटेहाल सी लग रही थी। तुलसीदास ने अपने रामचरितमानस के जरिये राम की जिस छवि को पूरे विश्व में स्थापित कर दिया उस राम की नगरी को देखने के बाद मुझे लगा कि मैं ही धोखे में नहीं बल्कि आज की इन स्थितियों ने स्वयं रामजी को भी धोखा में डाल दिया है। रामलला की जन्मभूमि सेना छावनी में तब्दील हो चुकी थी। सुरक्षा बलों की कड़ी जाँच से गुजरते हुए ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हम सीमा पार किसी पराये देश में प्रवेश कर रहे हों। फूल - माला इत्यादि का दूर - दूर तक नामों निशान न था। मंदिर वाली कहीं कोई बात दिखाई न पड़ी। भूमि तक जाने वाले गलियारों में दुनिया भर की गंदगी पसरी थी। सीता रसोई और राम मंदिर के नाम पर मठाधीश भक्तों को कदम - कदम पर भ्रमित कर उन्हें अपने घरों में बुला कर दर्शन करवाने के नाम पर दक्षिणा के नाम पर पैसे लूटने में जुटे हुए थे।

     एक ओर लूटपाट, दूसरी ओर गरीबी और इन सबके बीच कड़ी सुरक्षा जाँच के साथ जन्मभूमि की पुलिस छावनी में प्रवेश। ये सारी परिस्थियाँ मुझ जैसे नये नवेले भक्त के मन से भक्ति का नवजात भाव समाप्त कर देने के लिए पर्याप्त थीं। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि इन सबके बाद भी लाखों भक्तगण राम जी के नाम पर दक्षिण - पश्चिम भारत सहित देश – विदेश के कोने - कोने से राम दरबार में कृपा पाने की आस लिए चले आते हैं। कहीं सुना था किसी समय यही अयोध्या नगरी अपने संपूर्ण ऐश्वर्य से भगवान राम के साकेत धाम को भी लजा देती थी और आज लुटेरों और दंगाइयों ने साकेत धाम को लजाने वाली अयोध्या का ये हाल कर दिया कि यहाँ आने वाले विदेशी सैलानियों के आगे इसी अयोध्या की दशा पर हमें खुद ही लजाना पड़ रहा है। आँखों देखे इस कड़वे यर्थाथ से अचंभित, सारी बातों का चिंतन मनन करती हुई मैं सामान्य रूप से गतिशील उसके पैरों की ओर देखती रही। वह बड़ी मेहनत से सम्हलकर पैडल मारता हुआ रिक्शा चला रहा था। होटल पहुँचते ही रिक्शे से उतरकर सेवा पूर्ण कर देने की मुद्रा में वह विनीत भाव से खड़ा हो गया। उसने मुझसे कहा कि, “बिट्टी मैं यहीं थोड़ी दूरी पर रहता हूँ। यदि कल कनक भवन या जन्मभूमि जाना हो तो कहिये मैं सबेरे ही आ जाऊँगा।” हालाँकि हम आज ही सारे स्थलों का दर्शन कर चुके थे। कल सुबह ग्यारह बजे की ट्रेन से ही हमें मुंबई लौटना था। किन्तु जाने से पहले कल एक बार फिर राम जी के दर्शनों की इच्छा थी। उससे सुबह साढ़े सात बजे आने को कहकर तथा पचास का एक नोट उसे थमा कर हम होटल के भीतर चल पड़े। नोट हाथ में ले कर कुछ सोचता हुआ वह वहीं खड़ा रहा फिर रिसेप्शन से आगे हमें कमरे की ओर बढ़ते देख उसने रिक्शा मोड़ लिया।

    अगली सुबह साढ़े सात बजे चाय नाश्ता निपटा कर हम कमरे से बाहर निकलने ही वाले थे कि फ़ोन की घण्टी बजी। फ़ोन रिसेप्शन से था मैनेजर ने मुझसे पूछा, "मॅडम आपने किसी रिक्शे वाले को बुलाया था क्या?” मैंने हामी भरते हुए कहा कि हम तैयार हैं, बस निकल ही रहे हैं। हम तुरंत कमरा लॉक करके रिसेप्शन पर आ गए। मेनेजर ने मुझे बाहर की ओर इशारा कर सूचित किया कि यह रिक्शेवाला सुबह साढ़े छह बजे से होटल के बाहर खड़ा है और भीतर की ओर देख रहा है। उसकी मुद्रा से ऐसा प्रतीत होता है कि वह किसी के इंतजार में खड़ा है। इस समय सात पैंतीस हो रहा था और वो पिछले एक घंटे से हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। जबकि मैंने उसे साढ़े साथ बजे आने को कहा था। बाहर निकल कर मैंने उससे पूछा, "मैंने आपसे साढ़े सात बजे आने को कहा था फिर आप साढ़े छह बजे ही क्यों आ गए?” वह बड़ी सहजता से बोला,”बिट्टी मेरे पास घड़ी तो है नहीं। मै पढ़ा – लिखा भी नहीं हूँ। क्या समय हुआ है? मै भला क्या जानूँ? मैंने सोचा कि मेरे कारण आपको देर न हो जाये इसलिए सूरज उगते ही यहाँ पहुँच गया।” उसकी बातों ने मुझे निरुत्तर कर दिया था।

     दिन के उजाले में उसके चेहरे और हाथ की झुर्रियाँ साफ दिख रही थीं। ऊँचा कद, दुबला शरीर, गहरी छोटी आँखें, धूप में झुलसी हुई काली चमड़ी, जगह - जगह सिला हुआ कुर्ता, मैली सी धोती, पैरों में टूटी हुई चप्पल। साथ में पुरानी सी रिक्शा, फ़टी हुई सीट, उखड़े हुए किनारे। उसका तथा उसके रिक्शे का मुआयना कर मैंने माँ की ओर देखा माँ की आखों में भी यही सवाल था कि क्या इस रिक्शे में बैठना है? बूढ़ा गरीब ही नहीं अत्यंत दरिद्र भी था। उसने हाथ के इशारे से बताया कि यहीं कुछ दूर मेरा घर है। उसके इंगित दिशा की ओर मैंने देखा तो होटल से कुछ ही दूरी पर सड़क किनारे एक टूटा हुआ झोपड़ा दिखाई पड़ा। झोपड़े के आस - पास कनेर के पुष्प की क्यारियाँ थी। इतना सब देखने और जानने के बाद ना कहने का कोई कारण नहीं था मैंने सम्हाल कर माँ को रिक्शे पर चढ़ाया। सीट के किनारे की टीन जगह - जगह से फटी और उखड़ी हुई थी। चढ़ते समय कपड़ों के किनारों में फँसने अथवा फटने के डर से मैं भी बहुत सम्हल कर बैठी। इस बीच वह रिक्शे को कस कर पकड़ा रहा। अपने रिक्शे की स्थिति को वो हमसे बेहतर जानता था। हमारे बैठ जाने के बाद उसने रिक्शे के हैंडल पर टंगा हुआ अपना गमछा निकाला। बड़े धैर्य से गमछे की गाँठ खोलकर उसे मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने चौंक कर पूछा, “ये क्या? और मुझे क्यों दे रहे हैं?” गमछे में कनेल के ढ़ेर सारे ताजे पीले फूल थे। उसके इस व्यवहार से मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। मैंने उन फूलों को लेने से इंकार कर दिया। मेरे इंकार कर देने पर वह कुछ दुखी हो कर बोला, "बिट्टी ये फूल आज सुबह ही तोड़े हैं। आप कनक भवन जा रही हैं तो मेरी ओर से इन फूलों को रामजी के चरणों में चढ़ा देना। मैं तो बिट्टी कभी भीतर नहीं जा पाता। समय पर नहा धो भी नहीं पाता। नहा भी लूँ तो पहनने के लिए दूसरे कपड़े नहीं हैं। यही एक जोड़ी रोज पहनता हूँ। इसलिए भी मंदिर के भीतर नहीं जाता। जब भी कोई सवारी ले कर भवन जाता हूँ तो वहीं मुख्य द्वार पर हाथ जोड़ कर माथा टेक लेता हूँ। आपने कहा था कि आज सुबह आप कनक भवन जाएँगी इसलिए सबेरे जल्दी उठ कर ताजे फूल तोड़ कर ले आया हूँ। इन्हीं से उनके दरबार में मेरी हाजरी लगा देना। मैं न सही किन्तु मेरे भक्तिभाव स्वरूप ये पुष्प उनके श्री चरणों में पहुँच जाएँ तो बड़ी कृपा होगी। वे तो अयोध्या के नाथ हैं सबकुछ जानते हैं। उन्हीं की कृपा है कि हमें रोज रोटी मिल जाती है।" बूढ़ा राम जी की अदृश्य कृपा पर पूर्णरूप से कृतज्ञ था तथा आभार में उन्हें अपने श्रद्धासुमन अर्पित करना चाहता था।  उसकी दयनीय दशा को देखने और अब तक की बातें सुनने के बाद मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं इससे आगे कुछ पूछूँ या कहूँ!

      मैंने अपने रुमाल में सारे फूल सहेज कर पर्स में रख लिए। बूढ़ा गंभीर मुद्रा में रिक्शे पर बैठ कर पैडल चलाने लगा। हम सड़क के उस पार पहुँचे ही थे कि उसकी रिक्शा में कुछ खट सी आवाज आई और रिक्शा रुक गया। मैंने पूछा, “क्या हुआ? ये कैसी आवाज थी?” उसने कहाँ कुछ नहीं, बस दो मिनट में ठीक कर देता हूँ। आप बैठे रहिये। दो मिनट में कुछ ठीक कर वो फिर पूर्ववत रिक्शा चलाने लगा। कनक भवन तक पहुँचने में यहीं क्रम दो – तीन बार चलता रहा। वह जानता था कि उसके रिक्शे का मर्ज क्या है? किन्तु वह उसका इलाज़ करवाने में असमर्थ था इसलिए खुद ही कुछ कामचलाऊ उपाय कर आगे बढ़ता जाता। कनक भवन पहुँच कर वह किनारे एक ओर रिक्शा ले कर खड़ा हो गया। हम चप्पल उतार कर सीढ़ी चढ़ने लगे। मुख्यद्वार में प्रवेश कर भीतर आँगन के उस पार मुख्य मंदिर में प्रवेश किया तो पाया कि पट अभी खुला नहीं है। आठ बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे कल जिस माली से मैंने फूलों की बड़ी माला लाने को कहा था वो भी अभी आया नहीं था। समय हो चुका था, वह आता ही होगा! यह सोच कर हम भीतर पट के ठीक सामने बैठ गये। जो भक्त पहले से पहुँचे थे वे आँख मूँद रामनाम संकीर्तन में लीन थे। हम भी आँख मूँद कीर्तन का आनंद लेने लगे। थोड़ी – थोड़ी देर में मैं बाहर आँगन की ओर देखती जाती किंतु माली अब भी आया नहीं था। सवा आठ बज चुके थे। मंदिर का पट खुलने ही वाला था। कल उसने कहा का कि पट खुलने से पहले ही वह पहुँच जाता है किन्तु आज तो उसका कोई अता - पता न था। वह कनक भवन का एकलौता माली था। उसके न आने से सारे भक्तगण खाली हाथ ही रघुराई के दर्शन को विवश हो गये थे। भीड़ इतनी हो चुकि थी कि बाहर आँगन की ओर देख पाना मुश्किल हो गया। मैं बहुत आगे पट के बिलकुल सामने खड़ी थी। पट खुला, जय श्री राम के जयकारे लगने लगे, आरती शुरू हो कर अपनी गरिमा के साथ चलती हुई ख़त्म हो गयी। जय घोष होने लगे। मैंने अपने आस – पास देखा किसी के हाथ में फूलमाला नहीं दिखी। यह स्पष्ट था कि माली अब भी नहीं आया है। उस दिन आरती के बाद श्री सीता – राम को फूलों की कोई माला न पड़ सकी। मुझे बहुत अफ़सोस हो रहा था कि आज लौटते समय मै अपने प्रभु को कुछ भी अर्पित न कर पायी। कहाँ तो सोचा था कि चलने से पहले बेला – गुलाब की बड़ी सी माला चढ़ाउंगी और यहाँ तो आज अर्पण के लिए एक फूल तक नसीब नहीं। फूल के विषय में सोचते ही मुझे उस बूढ़े के दिए हुए फूल याद आये। मैंने पर्स में से रुमाल में लिपटे हुए फूल निकाल कर अंजली भर पीले कनेर के ताजे फूलों को राम जी की चरण पादुकाओं पर बिखेर दिया। कुछ फूल पंडित जी को दिए। उन्होंने मंत्रोच्चारण के साथ उन्हें सीता – राम के चरणों में अर्पित कर दिये। उस दिन श्री राम को अपने उसी भक्त के फूल स्वीकार करने थे जो अपने आप को हर कहीं से दीन - हीन मानता था। जो मंदिर के भीतर प्रवेश न कर बाहर से ही शीश झुका कर अपने मालिक को प्रणाम कर लिया करता था। प्रसाद ले कर हम बाहर निकले। माली अब भी नहीं आया। मैं जान गयी थी कि आज माली नहीं आयेगा क्योंकि आज राम जी नहा धो कर आये हुए भक्तों की माला के नहीं बल्कि पूर्ण रूप से पवित्र ह्रदय वाले उस बूढ़े के भावों के भूखे थे। मैं यही सोच – सोच कर गद्गद थी कि इस नेक कार्य के लिए अयोध्यानाथ ने मुझे चुना। उस दिन मंदिर में यह जो कुछ भी घटित हुआ था उसे मेरे और माँ के अलावा और कोई न जान पाया - न पंडित, न माली, न कोई दर्शनार्थी और न ही वह बूढ़ा। उन अदृश्य भावों व संवादों को महसूस कर मैं रोती जा रही थी। मेरे आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। बाहर आ कर देखा तो बूढ़ा हमारे इंतजार में खड़ा था। मैंने उसे कहा कि, “बाबा सालों से राम जी को आप ही के फूलों के फूलों की प्रतीक्षा थी। आज उन्होंने आपके भेजे फूल स्वीकार कर लिए।” हम रिक्शे में बैठ गये। वह होटल की दिशा में चल पड़ा। मै दुपट्टे की छोर से आँसू पोछती जाती। मेरे दिल ने कहा धीरे से कहा, “अयोध्या जरुर बदल गयी है किन्तु अयोध्यानाथ आज भी यहीं हैं।”

     जिसके दाता राम हों उसे कोई दे ही क्या सकता है? फिर भी, होटल पहुँच कर मैंने उसे कुछ सौ रूपये देने की कोशिश की। किन्तु उस संतोषी जीव के लिए कल के दिए पचास रुपये ही बहुत थे। इसलिए उसने आज कुछ भी लेने से इंकार कर दिया। मै चाहती थी कि वो उन रुपयों को ले ले और वह था कि मेहनत से अधिक कुछ भी लेने को तैयार न था। कुछ पल ठहर कर मैंने कहा, “ले लीजिये। इंकार न कीजिये। इसे राम जी की कृपा समझिये। इसमें आपका रिक्शा भी बन जायेगा और एक जोड़ी कपड़े भी आ जायेंगे।” बहुत संकोच के साथ उसने रूपये स्वीकार किये। साढ़े नौ हो चुके थे। होटल की गाड़ी हमारे इंतजार में तैयार खड़ी थी। हमें देख मैनेजेर ने ड्राईवर से कह कर हमारा सामान डिकी में रखवा दिया। रिसेप्शन पर बिल भुगतान कर हम गाड़ी में बैठ गये। बूढ़ा एक किनारे खड़ा हो कर हमें देखता रहा। आगे के चौराहे से बाएँ घूम कर राम पैड़ी, तुलसी उद्यान तथा हनुमान गढ़ी की गली पार करती हुई हमारी गाड़ी तेजी से स्टेशन की ओर बढ़ चली।


डॉ. जयश्री सिंह
सहायक प्राध्यापक एवं शोधनिर्देशक, हिन्दी विभाग,
जोशी - बेडेकर महाविद्यालय ठाणे, मुंबई - 400601
महाराष्ट्र

                      

कविता - क्षितिज

आकाश के गहरे शून्य में
क्षितिज पर धूमिल रेखा सी
वायु में विलीन
सिहरन में परिणित होकर
रोमांच जगा जाना चाहती हूँ
मैं अनल की तेज प्रखर हूँ
बुझ जाने से पहले
पावनतम को पाना चाहती हूँ।

लहरों से फुहार बनकर
किनारों पर बिखर - बिखर
साँसों में घुली मिली
मिट्टी की सौंधी ख़ुश्बू से
अंतर्मन महकाना चाहती हूँ
मैं पंचतत्व का समीकरण हूँ
विलीन होने से पहले
इतिहास रचाना चाहती हूँ।

'प्रार्थना प्रवचनों में गाँधी'

'प्रार्थना प्रवचनों में गाँधी' (युवा 2019 में मेरे विचार के कुछ बिंदु) हम एक स्मृतिहीन समय में जी रहे हैं। हमने अपने हिस्से की याद...