Sunday, June 24, 2018

संस्मरण : बर्फ की सफेद चादर तले

आज के नवभारत टाइम्स, मुंबई के 'विधा विविधा' में मेरा
#संस्मरण : बर्फ की सफेद चादर तले

http://epaper.navbharattimes.com/details/5128-71351-1.html

पीछे खेल के मैदान से आती हुई बच्चों की धीमी पड़ती आवाज लगभग गायब हो चुकी थी। शीत का असर सड़कों पर उतर आया था। नाविक अपनी नावों को किनारे कर रैन बसेरे की ओर बढ़ चले थे। ठिठुरती शीत की ढ़लती शाम की नीलिमा में दूर तक झिलमिलाती नैनीझील का रंग स्याह पड़ चुका था। झील किनारे बिखरे तमाम सैलानी तल्लीताल के होटलों में समा चुके थे। स्ट्रीट लाइट की मध्यम रोशनी में मैं देर तक ताल के  किनारे - किनारे उस स्थान को खोजती रही जहाँ उस दस वर्षीय गरीब पहाड़ी बालक की आत्मा ने निष्ठुर संसार से बिदाई ली थी।

कल रात यहाँ बर्फ गिरी थी। बर्फ से उसका गहरा नाता था। वर्षों पूर्व ऐसी ही बर्फीली रात में वह भूखे पेट यहीं किसी बेंच पर सो गया था। उस रात वो ऐसा सोया कि फिर कभी नहीं उठा। उस कहानी को पढ़ने के बाद मैंने माना कि प्रकृति केवल स्त्रीलिंग शब्द ही नहीं उसमें माँ सी ममता भी है। वह अपने बच्चों को भूख से बिलखता नहीं देख पाती इसलिए जब अमीरों की दुनिया एक मासूम की छटपटाहट को महसूस नहीं कर पाती तब गहन शीत की अँधेरी रातों में प्रकृति उन लावारिसों के अर्धनग्न शरीरों पर हौले से बर्फ की सफेद चादर ओढ़ाकर इस कठोर जीवन से उन्हें मुक्ति दिला देती है ताकि रोटी और कंबल से वंचित रह रहे दुबले - पतले ठंडे पड़ चुके शरीरों को कफ़न के लिए वंचित न होना पड़े।

यदि उस रात कहानीकार जैनेंद्र ने उसे दस का नोट दे दिया होता या अगली सुबह बुलाने की बजाएँ कल रात ही उसे होटल में शरण दिला दी होती अथवा काम पर रखवा दिया होता तो शायद सुबह इस बेंच पर उस गरीब की लावारिस लाश न पड़ी होती। यदि उस रात ये सब घटित न हुआ होता तो जैनेंद्र द्वारा 'अपना - अपना भाग्य' कहानी लिखी न जाती और न ही इस कथा के पाठकों को एक छोटे से बच्चे के दुर्भाग्य पर रोना पड़ता। वह बालक जो अभी ठीक से अपना भाग्य भी बना नहीं पाया था। वह जो इस शहर में बिलकुल अकेला था और अभी कुछ दिनों पहले ही गरीबी की त्रासदी झेलते पहाड़ी गाँव के किसी गरीब परिवार से भाग कर दो वक्त की रोटी की तलाश में यहाँ चला आया था।

जैनेन्द्र के कथा साहित्य में वर्णित इस लाचार बालक की मृत्यु ने इस सुसंस्कृत समाज की नाटकीय व्यवस्थाओं को कई बार धिक्कारा। इस कहानी को कक्षा में पढ़ते - पढाते कई बार मेरा दिल पसीजा। आखिर वह कैसी जगह है? जहाँ बर्फीली रात में खुले आसमान के नीचे रैन बसेरा करने वालों के नसीब में सुबह का सूरज नहीं लिखा होता। यहाँ आने के और भी कई कारण हो सकते थे किंतु मुझे जैनेद्र की वह मार्मिक कहानी अक्सर यहाँ बुलाती रही। ये भी सच है कि यदि जैनेन्द्र की यह कहानी पाठ्यक्रम में न लगी होती और तीन साल लगातार इसे पढ़ाना न पड़ा होता तो शायद ही मैं नैनीताल आने के लिए विवश इतनी हुई होती!

मुझे यहाँ आये अभी तीन ही दिन हुए थे। सुना था इस बार की ठंड ने पिछले बारह वर्षों का रेकॉर्ड तोड़ दिया है। यहाँ के मौसम की कसौटी में मेरे लाये हुए सारे गर्म कपड़े फेल हो चुके थे। कल सुबह ही तल्लीताल के बाजार से ढेर सारे गर्म कपड़े खरीद लायी थी और शाम को अप्रत्याशित रूप से बर्फ भी गिरी। मैंने पहली ही बार बर्फ की बारिश देखी थी। मुंबई की पहली बारिश में बचपन में नाचने वाली आदत इस समय मन में उमंग जगा गयी। साथियों के मना करने के बाद भी गेस्ट हाउस के अहाते से निकलकर उस बारिश में भीग कर नाची थी। उस रात बिस्तर पर लेटते ही हड्डियों तक पहुँच चुकी शीत ने उसकी मौत वाली रात की याद दिला दी। वह दस वर्ष का बालक मेरे जेहन में पहले से घर कर चुका था। मेरे शहर की गुलाबी सर्दी बचपन से ही मुझे लुभाती रही किन्तु इसप्रकार की शीतलहरी से पहली बार मेरा पाला पड़ा था। लगातार चलने वाले हीटर से नाममात्र के गर्म हो रहे कमरे में सात रजाई के नीचे मैं देर रात तक उस कंपकपाती हुई सर्दी को अपने पोर – पोर में महसूस करने लगी जिसे शायद मौत से पहले उसने महसूस किया होगा। सुबह लेक्चर में भी मन नहीं लग पाया। शाम को क्लास से छूटते ही कुमाऊँ यूनिवर्सिटी के कैंपस से निकल कर सीधे नैनीझील के किनारे आ गयी।

धुंधली रोशनी में दूर तक झिलमिलाता ताल निःशब्द कोई शोकगीत सुना रहा था। मैं चर्च की बाईं ओर के लोहे की बेंच पर सिकुड़कर बैठ गयी। मुझे जैनेंद्र की कहानी में नैनीझील के किनारे लोहे के बेंच पर अंतिम बार लेटे उस बालक से लेखक के मिलने वाले प्रसंग की याद हो आयी। वर्षों पहले लेखक अपने मित्र के कहने पर होटल के गर्म कमरे की नर्म रजाई छोड़कर बर्फ सी जम चुकी झील के किनारे रात्रिभ्रमण के लिए आये थे। उस अकेले बालक को यहीं कहीं बेंच पर ठिठुरता देख उदार मन से वे उसे कुछ देने के इरादे से उसके पास भी गये किंतु अपने कोट की जेब में दस के नोट से छोटा कोई नोट न पा कर हाथ जेब से बाहर न निकाल पाये थे। उन दिनों दस का नोट भी बहुत कीमती हुआ करता था। कहानी में एक जगह उन्होंने लिखा भी है कि, “यदि दस का नोट दे देता तो अगले दिन के खर्च का हिसाब गड़बडा जाता।” वे विवश मन से कुछ देर वहीं खड़े रहे। फिर मित्र के चलने के आग्रह पर कल सुबह उससे सामने वाले होटल में मिलने की बात कहकर आगे बढ़ गए। सुबह पता चला कि रात गिरी बर्फ ने उसकी मासूम भूख को सदा के लिए शांत कर दिया है। शायद उनकी कहानी उसी ग्लानी की उपज थी।

इसी स्थान को देखने और उस निर्मम रात को करीब से महसूस करने के इरादे से मैं समुद्र किनारे की गर्म दुनिया से दूर उत्तराखण्ड के पहाड़ों पर शीतलहरी के प्रतिकूल मौसम में तीन हफ्ते के रिफ्रेशर कोर्स के बहाने नैनीताल और इस झील के किनारे खींची चली आयी थी।

#जयश्रीसिंह , मुंबई

No comments:

Post a Comment

'प्रार्थना प्रवचनों में गाँधी'

'प्रार्थना प्रवचनों में गाँधी' (युवा 2019 में मेरे विचार के कुछ बिंदु) हम एक स्मृतिहीन समय में जी रहे हैं। हमने अपने हिस्से की याद...