लगभग पूरा वेटिंग रूम खाली हो चुका था। अब तक न जाने कितने परिवार आये और अपनी ट्रेन के आने के साथ ही चले गए। एक मैं ही थी जो पिछले सात घंटे से अंजाने शहर के अंजाने स्टेशन पर अकेली बैठी अपनी ट्रेन की प्रतीक्षा कर रही थी। सामने बैठा एक यात्री जाने कब से मुझे घूर रहा था। मैंने यह दर्शाने की भरसक कोशिश की कि उनकी इस दृष्टि का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ रहा जबकि ठंड और डर के मारे मेरे पैर सुन्न पड़ रहे थे। जनवरी का महीना था। रात का तापमान दस डिग्री सेल्सियस के नीचे पहुँच चुका था। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी भाषा - शब्द और उच्चारण की शैली इस शहर में मेरे अजनबी होने का राज़ खोले। मैंने चुप रहने में भलाई समझी। इसके अलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं था। इस समय मैं अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर हरियाणा के अंबाला कैंट स्टेशन पर रात एक बजे अकेली बैठी एक अप्रत्याशित यात्रा का हिस्सा बन रही थी।
ऐसा नहीं कि ये मेरी पहली यात्रा थी। इससे पहले भी मैंने कई बार मुंबई से दिल्ली, बनारस (और चंडीगढ़ पहुँचने तक की) अकेली यात्राएँ की थी किंतु इसबार की यात्रा मुझे इसप्रकार असहाय बना देगी इसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
मैं चंडीगढ़ के पंजाब यूनिवर्सिटी में एक हफ़्ते के शॉर्ट टर्म कोर्स के लिए गयी हुई थी। इस कोर्स को इस मंगलवार से शुरु हो कर अगले सोमवार के दिन ख़त्म होना था। उसी शाम की फ़्लाइट से मुझे मुंबई लौटना था। हर बार की तरह अपनी इस यात्रा को भी मैंने सुनियोजित ढंग से तय कर लिया था किंतु कोर्स संयोजक ने शुक्रवार के दिन लंच के पहले वाले सत्र में अचानक ही अगले दो दिनों की छुट्टी घोषित कर दी। जबकि कोर्स के शेड्यूल में छुट्टी की कोई पूर्व सूचना नहीं थी।
इस कोर्स के लगभग सारे प्रतिभागी पंजाब - हरियाणा व आस - पास के क्षेत्रों से आये थे। दो दिनों की छुट्टी की सूचना पाते ही सोमवार को सीधे क्लास में आने का मन बनाकर वे सब अपने - अपने घर लौट गए। शुक्रवार शाम चार बजे तक चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस की दो मंजिला इमारत बिलकुल खाली हो गयी। दूसरे फ्लोर के आखरी कमरे में मैं ही एक अकेली बच गयी। दो दिनों के लिए मुंबई जा कर सोमवार को पुनः चंडीगढ़ लौट कर कोर्स पूर्ण कर पाना मेरे लिए संभव नहीं था। मैं कॉलेज से ड्यूटी लीव ले कर आयी थी ऐसे में इस कोर्स को पूर्ण कर लौटना मेरी मजबूरी थी। चंडीगढ़ मेरे लिए पूरी तरह नया शहर था। मैं यहाँ पहली बार आयी थी। बीते चार दिनों में लुधियाना, मोहाली से आयी हुई महिला प्रतिभागियों के साथ अकेलेपन का आभास ही नहीं हुआ किंतु आज अचानक से खाली हो जाने वाला गेस्ट हाउस मुझे कई प्रकार से डराने लगा था। शाम को पता चला कि हमारा केयर टेकर भी दो दिनों की छुट्टी ले कर घर जा रहा है। नीचे कैटिंग वालों को इस बात की जानकारी मिल चुकी थी कि अब उन्हें दो दिन केवल मेरे लिए ही खाना बनाना है। कोई जाने न जाने किंतु उन्हें तो मेरे वहाँ अकेले रहने की सूचना मिल ही चुकी थी। दिन का समय मैं जैसे तैसे काट लेती लेकिन खाली पड़ी इमारत के ऊपरी मंजिल पर दो दिन - तीन रात अकेले रहना मुझे कहीं सुरक्षित नहीं लग रहा था।
क्राइम पेट्रोल की सुनी - सुनायी वारदातें मेरे दिमाग में कौंध गयीं। अभी कल ही चंडीगढ़ में घटित एक घिनौनी घटना ने पूरे देश को दहला दिया था। मेरे पास सोचने का समय नहीं था। जनवरी का महीना और कड़ाके की ठंडी। मुझे अँधेरा होने से पहले निर्णय ले लेना था। मैंने जल्दबाजी में पर्स उठाया, कमरा लॉक किया, नीचे कैंटीन वालों को दो दिन मेरे लिए खाना न बनाने की सूचना दे कर अंबाला स्टेशन के लिए बस पकड़ ली।
आख़िरकार मैं जा कहाँ रही हूँ, मुझे खुद इस बात की कोई जानकारी नहीं थी। एक अंजाने शहर में जहाँ एक भी व्यक्ति मेरा परिचित नहीं था वहाँ मुझे तीन रात - दो दिन का समय अकेले काटना था। मैंने बस में बैठे - बैठे ही IRCTC की साइट पर जा कर अंबाला से आने - जाने वाली ट्रेनों का पता लगाया। पूरी साइट छान मारने के बाद मैंने अमृतसर जाने व आने का टिकट बुक कर लिया। इत्तेफ़ाक से दोनों समय मुझे मुंबई अमृतसर गोल्डन टेम्पल में रिजर्वेशन मिल गया। अंबाला से अमृतसर की दूरी चार घंटे की थी इतने में रात का समय सफर और प्लेटफॉर्म पर ट्रेन के इंतजार में काटा जा सकता था। दोनों ओर का टिकट निकाल कर परसों सुबह तक का समय मैंने सुरक्षित कर लिया था। अँधेरा होने से पहले मैं अम्बाला कैंट पहुँच चुकी थी और पिछले कई घंटों से वेटिंग रूम में बैठी घंटे गिन - गिन कर कठिन समय को काट रही थी।
इस समय रात के सवा एक बज रहे थे। आगे बढ़ने वाला समय भय और आशंका को बढ़ाने लगा था। मैंने बाहर प्लेफॉर्म पर आ कर देखा। वहाँ अच्छी खासी भीड़ थी। लोग जहाँ-तहाँ कंबल में लिपटे पड़े थे। प्लेटफॉर्म दो पर दृष्टि डाली। वहाँ लगभग ना के बराबर ही कोई था। मेरी ट्रेन 1:40 पर अंबाला कैंट के प्लेटफॉर्म दो पर आने वाली थी। ट्रेन के आने में आधे घंटे का समय था। बाहर ठंड अधिक थी। वहाँ देर तक अकेले खड़े रहना मुझे ठीक नहीं लगा। मैं वेटिंग रूम में लौट आयी। मैंने शाम को ही माँ को फोन कर सारी बात बता दी थी सिवाय इसके कि मैं अमृतसर अकेली जा रही हूँ। मैंने उन्हें सुरक्षित होने का पूरा विश्वास दिला दिया था जबकि इस समय मैं बिलकुल असहाय थी..., बिलकुल अकेली...और.., लगभग रुआँसी..।
वेटिंग रूम में बचे एकाध पुरुष यात्री अपना सामान सुरक्षित कर सो चुके थे। लगभग खाली पड़े कमरे में मैं अकेली अपने जीवन के कठिन क्षणों की परीक्षा दे रही थी। मैंने सुना था जिसका कोई नहीं होता उसका भगवान होता है। मैंने मन ही मन कण - कण में बसे उसे निराकार से अपनी रक्षा की गुहार लगायी और पूरे धैर्य से उस ट्रेन की प्रतीक्षा करने लगी जिसकी अब तक कोई सूचना नहीं थी।
कुछ ही देर में एक लड़का फोन पर बात करते हुए वेटिंग रूम में घुसा। मैं कुछ सतर्क हुई। वह सीधे मेरी बायीं ओर की बेंच पर जा कर बैठ गया। वह किसी से मराठी में बात कर रहा था। वह सामने वाले को बता रहा था कि मुंबई - अमृतसर गोल्डन टेंपल 1:50 तक आएगी। अतः कुछ ही देर में वह ट्रेन ले लेगा। वह कौन था मुझे पता नहीं किंतु उसकी भाषा और उसकी ट्रेन यह बता रही थी कि वह मुंबई का रहने वाला है।
एक अंजाने शहर में अपनी जानी पहचानी भाषा का प्रभाव क्या होता है? यह मैंने पहली बार महसूस किया। हरियाणा में देर रात अपनी जिस बम्बईया हिन्दी के डर से मैं अब तक चुप बैठी रही उस समय मुझे अपनी उसी परिचित भाषा का वह अंजाना व्यक्ति भी बेहद विश्वसनीय लगने लगा। उसके फोन रखते ही मैंने उससे मराठी में कहा, "गोल्डन टेंपल एक पन्नास ला नाहीं, एक चाळीस ला येणार आहे." (गोल्डन टेंपल एक पचास पर नहीं, एक चालीस पर आने वाली है।) मराठी में कहे मेरे इस वाक्य ने उसे भी उतना ही चौंकाया जितना कि उसकी भाषा ने मुझे। वह कुछ देर आश्चर्य से मेरी ओर देखता रहा। मैंने दोबारा अपनी बात दोहराई। हम दोनों के बीच हल्की सी बहस हुई। फिर यह स्पष्ट हुआ कि मुझे 'मुंबई - अमृतसर गोल्डन टेंपल' से अमृतसर जाना है और उसे 'अमृतसर - मुंबई की गोल्डन टेंपल' से मुंबई। गुगल पर मिली जानकारियों से हमने यह पता लगाया कि दोनों यात्रियों की ट्रेन दस मिनट की देरी पर एक दूसरे को इसी स्टेशन पर क्रॉस करती है।
इसके पहले कि कोई और बात होती! मेरे ट्रेन के आगमन की घोषणा होने लगी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसके शहर की एक अकेली लड़की रात पौने दो बजे इस अंजाने स्टेशन से विपरीत दिशा में अकेली यात्रा करने वाली है। मेरे उठते ही उसने कहा, "चलिए, मैं आपको आपके कोच तक छोड़ देता हूँ।"
एक मैं जो अपने कारण किसी को भी कष्ट नहीं देना चाहती थी अतः बिना किसी को कुछ सूचित किये चुपचाप अपनी यात्रा का बोझ ढो रही थी और एक वो जिसे इस समय न जाने किस कर्तव्यबोध ने घेर लिया था। वह मेरी सहायता करने को तत्पर हो उठा। वह मेरी सीट के आस - पास मेरा सामान खोजने लगा। मैंने आगे बढ़ते हुए कहा कि मेरे पास कोई सामान नहीं है। मैं एक दिन के लिए जा रही हूँ। कल रात इसी ट्रेन से मुझे लौटना है।
उसे अपने साथ चलते देख मेरा आत्मविश्वास बल पा चुका था। मैं बड़ी फुर्ती से ब्रिज चढ़ने लगी। उतरने तक गाड़ी प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी। शायद! ही कोई इस ट्रेन से उतरा था। मैं लगभग दौड़ती हुई अपने कोच तक पहुँची। डिब्बे में चढ़ कर मैंने पीछे मुड़ कर देखा। वह धीरे - धीरे चलता हुआ वहीं कुछ दूर रुक गया था। मैंने उसे हाथ हिला कर 'बहुत - बहुत धन्यवाद!' कहा और भीतर आ गयी। ट्रेन लगभग भरी हुई थी। लोग गहरी नींद में सो रहे थे मैं चुपचाप अपनी सीट पर आ कर लेट गयी। मुझे देर तक नींद नहीं आयी। शाम से अब तक की सारी घटनाएँ क्रमबद्ध मेरे दिमाग में रील की तरह दौड़ने लगी।
एक अंजाने शहर में जानी पहचानी भाषा के एक अंजाने व्यक्ति का अचानक इस समय मिल जाना (जिस समय मुझे किसी अपने की बेहद जरुरत थी) मेरे लिए किसी दुर्लभ संयोग से कम नहीं था। मैं सोचने लगी कि मेरी गोल्डन टेंपल की जगह उसकी गोल्डन टेंपल 10 मिनट पहले आ सकती थी! या फिर मेरी ट्रेन लेट भी तो हो सकती थी। इस कुँहरे वाली रात में ट्रेनों का क्या भरोसा? वो मुझसे पहले भी निकल सकता था। आश्चर्य ही था कि मेरी ट्रेन राइट टाइम थी। सहसा मुझे वह वाक्य याद आया - 'जिसका कोई नहीं होता उसका भगवान होता है।'
No comments:
Post a Comment